भुवनेश्वर में मई की शामें अजीब तरह से दो हिस्सों में बँटी होती हैं। एक हिस्सा धूप का होता है, जो देर तक दीवारों और बस स्टॉप की छतों पर अटका रहता है; दूसरा हिस्सा हवा का, जो अचानक नम होकर बताने लगती है कि कहीं न कहीं बादल जम रहे हैं। शाहिद नगर की उस गली में, जहाँ पुराने साइनबोर्ड वाली छोटी-छोटी दुकानें शाम होते-होते पीली रोशनी में नरम दिखने लगती थीं, ‘पेज एंड पाज़’ नाम का बुकस्टोर बाहर की दुनिया से अलग एक धीमी जगह था। दरवाज़ा खोलते ही घंटी की छोटी-सी आवाज़ आती, फिर कागज़, कॉफी और लकड़ी की मिली हुई गंध। भीतर दायीं ओर नई किताबों की रैक थी, बायीं ओर सेकेंड-हैंड किताबों की शेल्फ, और सबसे अंदर खिड़की के पास वह कोना जहाँ दो लोग महीनों से बैठते आ रहे थे, जैसे कोई बातचीत वहीं सुरक्षित रहती हो।
रिद्धिमा उस दिन भी समय से पहले पहुँच गई थी। उसने हल्की नीली कॉटन कुर्ती पहनी थी, बाल ढीले बाँधे थे और बैग में दो चीज़ें अलग से रखी थीं—एक नोटबुक जिसमें उसने बच्चों के लिए होने वाली रीडिंग वर्कशॉप के आइडिया लिखे थे, और दूसरी एक पतली-सी कविता की किताब जिस पर पीले स्टिकी नोट्स लगे हुए थे। वह पेशे से इंटीरियर स्टाइलिस्ट थी, लेकिन किताबों के साथ उसका रिश्ता नौकरी से बाहर का था; किताबें उसे सजावट की चीज़ नहीं लगती थीं, बल्कि वे जगहें लगती थीं जहाँ कोई अपने सबसे असली रूप में बैठ सकता है। शायद इसीलिए उसने पिछले चार महीनों में अपनी सबसे सधी हुई, सबसे कम अभिनय वाली बातचीत अनंत के साथ इसी बुकस्टोर के कोने में की थी।
अनंत शहर के एक स्कूल में इतिहास पढ़ाता था और सप्ताहांत में इसी बुकस्टोर के मालिक के साथ मिलकर बच्चों का छोटा-सा रीडिंग क्लब चलाता था। उसकी आदत थी कि वह किताबों के हाशिये पर बहुत छोटे अक्षरों में नोट लिखता, जैसे शब्द किसी और को नहीं, सिर्फ़ खुद को समझाने के लिए हों। रिद्धिमा उन नोट्स का जवाब अलग रंग की पेंसिल से देती। यह सिलसिला एक ही किताब पर साथ में हाथ टिक जाने से शुरू हुआ था। उस दिन उन्होंने हँसकर हाथ पीछे खींच लिए थे; फिर दुकानदार देबाशीष ने कहा था, “किताब एक ही है, पढ़ना साथ-साथ कर लीजिए।” और जाने क्यों, वही वाक्य उनके बीच टिक गया। उसके बाद वे हर शनिवार किसी न किसी बहाने उस कोने तक आ जाते—कभी बच्चों की किताबें चुनने, कभी पोस्टर डिज़ाइन देखने, कभी सिर्फ़ इसलिए कि कुछ बातें फोन पर नहीं कही जा सकतीं।
लेकिन कुछ बातें सामने बैठकर भी नहीं कही जा रही थीं। रिद्धिमा के भीतर पिछले रिश्ते की एक धूल भरी परत अब भी थी। उसकी सगाई दो साल पहले टूटी थी, और टूटना इतना साफ़ नहीं था कि उसे किसी एक गलती पर रखकर समझा जा सके। बस इतना हुआ था कि जिस आदमी के साथ उसने घर की कल्पना की थी, वही आदमी धीरे-धीरे उसके हर संदेश, हर दोस्ती, हर देर से आने के पीछे सवाल लगाने लगा। वह रिश्ता खत्म होने के बाद रिद्धिमा ने अपने भीतर एक नियम बना लिया था—कोई भी निकटता इतनी जल्दी नाम नहीं पाएगी कि उसके साथ फिर नियंत्रण और उम्मीदों की वही पुरानी दीवारें आ खड़ी हों। अनंत का घाव अलग था। उसके पाँच साल पुराने प्रेम का अंत किसी झगड़े से नहीं, बल्कि थकान से हुआ था। दूसरी तरफ़ की लड़की ने उससे कहा था कि वह बहुत भरोसेमंद है, लेकिन उसके साथ जीवन बहुत अनुमानित हो जाएगा। यह वाक्य अनंत के भीतर कहीं फँस गया था। तब से वह किसी को रोकने की कोशिश नहीं करता था; उसे डर रहता था कि कहीं उसका शांत स्वभाव ही किसी के लिए उबाऊ न साबित हो जाए।
इन दोनों के बीच इसलिए जो कुछ था, वह साफ़ होने के बजाय धीरे-धीरे जमा हुआ था। साझा नोट्स, छोटी चाय, बच्चों के लिए चुनी गई कहानियाँ, बारिश रुकने तक इंतज़ार, और हर बार जाते हुए वह आधा-सा वाक्य जो दोनों के चेहरे तक आता, लेकिन होंठों पर आकर रुक जाता। शहर के बाहर वालों को शायद यह एक साधारण दोस्ती लगती, लेकिन आसपास के लोग इतनी सादगी से संतुष्ट नहीं होते। रिद्धिमा की मौसी ने दो बार पूछ लिया था, “वह इतिहास वाले सर सिर्फ़ किताबें चुनते हैं या तुम्हारे लिए समय भी?” अनंत की माँ ने एक रविवार वीडियो कॉल पर कहा था, “तुम्हारी आवाज़ हर बार उसी बुकस्टोर में जाकर अलग क्यों लगती है?” वे दोनों हर बार हँसी में बात टाल देते थे। हँसी राहत भी देती थी और बचाव भी।
मुसीबत उस शाम एक मीम से शुरू हुई। रिद्धिमा अपनी दोस्त मीनल को एक स्क्रीनशॉट भेजना चाहती थी—एक लोकप्रिय रील का स्टिल था, जिसमें लिखा था, “भारतीय फैमिली ग्रुप में दो लोग ऐसे ज़रूर होते हैं जिन्हें हर फोटो में शादी का कोण दिख जाता है।” उसके नीचे उसने मज़ाक में टाइप किया, “हमारे घर वाले तो बुकस्टोर में भी मंगलसूत्र ढूँढ लेंगे।” वह संदेश मीनल को नहीं गया। वह सीधे ‘समंता फैमिली सर्कल’ नाम के उस WhatsApp ग्रुप में चला गया, जिसमें उसकी माँ, मासी, दो फूफियाँ, कुछ चचेरे भाई-बहन और संयोग से अनंत की बुआ भी थीं क्योंकि किसी पुराने पारिवारिक कार्यक्रम में नंबर जुड़े थे और फिर कभी निकले नहीं। तीन मिनट के भीतर हँसी वाले इमोजी आए, फिर “अरे वाह”, फिर “किस बुकस्टोर की बात हो रही है?”, फिर उसकी मासी का संदेश—“बेटा, अगर कुछ अच्छा हो रहा है तो छुपाना क्यों?” और फिर वह चीज़ जिससे आजकल हर छोटा मज़ाक बड़ा हो जाता है—स्क्रीनशॉट। किसी ने वह स्क्रीनशॉट अनंत की माँ को अलग से भेज दिया था।
रिद्धिमा को गलती का पता तब चला जब उसने फोन खोला और नोटिफिकेशन ऐसे चमक रहे थे जैसे किसी ने उसके निजी डर पर टॉर्च मार दी हो। उसका चेहरा गरम हो गया। उसने तुरंत संदेश डिलीट किया, फिर सफ़ाई लिखी, फिर मिटाई। उसे सबसे ज़्यादा शर्म मीम की वजह से नहीं, उस सच की वजह से लग रही थी जो मज़ाक में निकल आया था। क्या सचमुच उसे यह चिढ़ थी कि घर वाले उसे और अनंत को साथ देखकर कोई निष्कर्ष निकाल लेते हैं? या चिढ़ इसलिए थी कि निष्कर्ष कहीं उसके अपने मन से मेल खाने लगे थे? उसने मीनल को कॉल किया, लेकिन पहले ही घंटी में काट दिया। फिर एक लंबी साँस लेकर वह बुकस्टोर के लिए निकल पड़ी, क्योंकि वर्कशॉप की तैयारी टालना अब और भी अजीब लगता।
अनंत पहले से वहाँ बैठा था। खिड़की के बाहर बादल अब सचमुच घिर आए थे, और भीतर पीली रोशनी में उसका चेहरा हमेशा से थोड़ा ज़्यादा गंभीर लग रहा था। सामने दो कप रखे थे। एक उसके लिए। यही आदत रिद्धिमा को कमजोर करती थी—अनंत बहुत कम बोलकर भी यह दिखा देता था कि उसने जगह बना रखी है। वह कुर्सी खींचकर बैठी, बैग नीचे रखा और बिना भूमिका के कह दिया, “मुझे पता है। मीम मेरे हाथ से गलत ग्रुप में चला गया।” अनंत ने उसकी तरफ़ देखा, न मुस्कुराया, न नाराज़ हुआ। बस बोला, “माँ ने भेजा था। पहले उन्हें हँसी आई, फिर उन्होंने पूछा कि क्या मुझे कुछ पता है।”
रिद्धिमा ने उसकी आँखों में वह तलाशने की कोशिश की जिससे वह खुद डर रही थी—क्या उसे बुरा लगा? क्या वह अपमानित महसूस कर रहा है? क्या उसे लगेगा कि वह उसकी और उसके परिवार की खिल्ली उड़ा रही थी? उसने जल्दी-जल्दी कहना शुरू किया, “मैं तुम्हारा मज़ाक नहीं उड़ा रही थी। बस… मुझे यह अच्छा नहीं लगता कि लोग दो लोगों को साथ देखकर तुरंत कहानी लिख देते हैं। और शायद मुझे खुद भी समझ नहीं आता कि मैं किस बात से भाग रही हूँ। इसलिए मज़ाक कर दिया।” उसकी आवाज़ आख़िरी वाक्य पर धीमी हो गई। दुकान के बाहर पहली बूँदें काँच पर टिकने लगी थीं। देबाशीष सामने काउंटर पर किसी ग्राहक को बिल बना रहे थे। भीतर की दुनिया सामान्य थी, लेकिन रिद्धिमा को लगा जैसे इस छोटे-से कोने में हवा भारी हो गई है।
अनंत ने सामने रखी नोटबुक उसकी ओर सरकाई। ऊपर उसने बच्चों की किताबों की सूची के पास एक खाली जगह पर पेंसिल से लिखा था—“क्या हम सच में सिर्फ़ लोगों की कहानी से परेशान हैं, या अपनी कहानी से भी?” रिद्धिमा ने पढ़ा, फिर उसकी तरफ़ देखा। यही उनकी आदत थी। मुश्किल बात पहले लिखी जाती थी, फिर बोली जाती थी। उसने पेन उठाया और नीचे लिखा—“अपनी कहानी से ज़्यादा। क्योंकि उसे बोलते ही वह असली हो जाएगी।” अनंत ने हल्की साँस छोड़ी, जैसे वह इसी उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा हो। उसने कहा, “मुझे मीम से बुरा नहीं लगा। मुझे सिर्फ़ यह लगा कि हम दोनों शायद इतने महीनों से एक ही जगह खड़े हैं और हिलने से डर रहे हैं। बाकी लोग बस शोर हैं।”
रिद्धिमा ने पहली बार उस शाम कप उठाया, मगर चाय ठंडी हो चुकी थी। उसे याद आया कि पिछले महीने जब वे बच्चों के लिए ‘घर’ विषय पर किताबें चुन रहे थे, तब अनंत ने कहा था कि कुछ घर दीवारों से नहीं, आदतों से बनते हैं। उसने उस वक़्त बात को यूँ ही लिया था, लेकिन बाद में पूरे रास्ते वही वाक्य उसके साथ चला था। उसने अब धीरे से पूछा, “अगर मैं कहूँ कि मुझे डर है… कि कोई भी रिश्ता शुरू होते ही मुझसे मेरी सहजता छीन लेगा, तो?” अनंत ने तुरंत जवाब नहीं दिया। उसने खिड़की पर गिरती बारिश देखी, फिर कहा, “तो मैं कहूँगा कि तुम्हें मुझे ‘कोई भी’ में शामिल करने की जल्दी नहीं करनी चाहिए। मैं तुम्हारे डर के खिलाफ़ अपनी तरफ़ से बहस कर सकता हूँ, लेकिन तुम्हारे ऊपर दावा नहीं कर सकता।”
उस उत्तर में वही बात थी जो रिद्धिमा पिछले महीनों में महसूस करती रही थी और ठीक इसी वजह से उससे और डरती भी रही थी। अनंत उसे पकड़ना नहीं चाहता था। शायद इसलिए उसके साथ ठहरना आसान लगता था। मगर आसान चीज़ें ही कभी-कभी सबसे बड़ी सच्चाई बन जाती हैं। उसने एक पल को आँखें बंद कीं। फोन अब भी बैग में कंपन कर रहा था—शायद घर से और संदेश, शायद मीनल की कॉल, शायद किसी चचेरी बहन का मज़ाक। उसने बैग की चेन पूरी तरह बंद कर दी। “मुझे लगता है,” वह बोली, “मीम गलत जगह गया, पर बात गलत नहीं थी। मैं सच में थक गई हूँ हर चीज़ को मज़ाक में बदलते-बदलते। अगर लोग पूछते हैं कि तुम कौन हो, तो मैं हर बार ‘दोस्त’ कहकर बच निकलती हूँ, और बाद में खुद से नाराज़ हो जाती हूँ। लेकिन अगर मैं इससे ज़्यादा कहूँ, तो मुझे डर लगता है कि सब कुछ बदल जाएगा।”
अनंत थोड़ा आगे झुका। उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी, पर पहली बार उसमें वह अनिश्चितता साफ़ सुनाई दी जो वह आमतौर पर छिपा लेता था। “सब कुछ बदलेगा,” उसने कहा, “लेकिन हर बदलाव खराब नहीं होता। मैं भी डरता हूँ। मुझे यह डर लगता है कि कहीं मैं तुम्हारे लिए बहुत स्थिर, बहुत सीधा, बहुत अनुमानित न साबित हो जाऊँ। लेकिन मैं इतना जानता हूँ कि तुम्हारे साथ जो है, वह सिर्फ़ समय काटने वाली दोस्ती नहीं है। अगर तुम कहो तो हम इसे अभी कोई नाम न दें। अगर तुम कहो तो नाम दे दें। लेकिन कम से कम यह तय करें कि हम इसे सिर्फ़ इसलिए हल्का नहीं बनाएँगे क्योंकि लोग देख रहे हैं।”
किताबों की शेल्फ के बीच से एक छोटा लड़का भागता हुआ आया और देबाशीष ने उसे धीरे से टोका, “आराम से।” उस साधारण-सी आवाज़ ने जैसे कमरे की तनी हुई डोर थोड़ी ढीली कर दी। रिद्धिमा अचानक मुस्कुरा दी। उसे लगा कि जीवन अक्सर सबसे निर्णायक वाक्य भी बहुत आम पृष्ठभूमि में सुनाता है—बिल मशीन की बीप, बारिश की आवाज़, पुरानी किताबों की गंध के बीच। उसने नोटबुक अपनी ओर खींची और इस बार बिना रुके लिखा—“नाम बाद में तय कर लेंगे। छुपाना अब नहीं।” फिर उसने पन्ना उसकी ओर कर दिया। अनंत ने पढ़कर पहली बार उस शाम पूरा मुस्कुराया। उसकी मुस्कान में राहत कम, जिम्मेदारी ज़्यादा थी, और शायद रिद्धिमा को यही चाहिए था—कोई ऐसा उत्साह नहीं जो अगले दिन ठंडा पड़ जाए, बल्कि ऐसा स्वीकार जो धीरे-धीरे निभाया जा सके।
बात वहीं खत्म नहीं हुई। असली मुश्किल बाहर इंतज़ार कर रही थी। रिद्धिमा ने फोन खोला तो परिवार के संदेश अब भी भरे पड़े थे। किसी ने दिल वाला इमोजी भेजा था, किसी ने आँख मारती स्माइली, किसी ने सीधा पूछा था, “बात आगे बढ़ाएँ?” उसे फिर से झुँझलाहट हुई, लेकिन अब उसके भीतर घबराहट उतनी अकेली नहीं थी। उसने अनंत की तरफ़ देखा। “मैं घर जाकर क्या कहूँ?” उसने पूछा। अनंत ने कुछ सोचा, फिर वही व्यावहारिक सादगी से बोला, “सच का छोटा हिस्सा। इतना कि तुम्हें झूठ न बोलना पड़े, इतना नहीं कि तुम्हें घेर लिया जाए। कह दो कि हम एक-दूसरे को पसंद करते हैं और समझने की कोशिश कर रहे हैं। बाकी किसी निर्णय की घोषणा मत करो।” रिद्धिमा हँस पड़ी। “इतिहास पढ़ाने का असर है क्या? तुम्हारे पास हर बात का संतुलित उत्तर क्यों होता है?” अनंत ने भी हँसते हुए कहा, “क्योंकि साम्राज्य भी जल्दबाज़ी से टूटते हैं।”
बारिश थोड़ी थमने लगी थी। बुकस्टोर बंद होने का समय करीब था। देबाशीष ने शेल्फ ठीक करते हुए पीछे से आवाज़ दी कि अगले हफ़्ते की वर्कशॉप का पोस्टर भेज देना। रिद्धिमा ने बैग उठाया। दरवाज़े तक पहुँचकर वह ठिठकी। बाहर सड़क पर गड्ढों में रोशनी काँप रही थी, लोग छाते खोल रहे थे, और हवा में मिट्टी की वह गंध थी जो भुवनेश्वर की पहली बरसात को शहर भर में फैला देती है। उसे लगा कि आज का दिन याद रहेगा, लेकिन मीम की वजह से नहीं। इसलिए कि महीनों से जिस बात को वे नोट्स, संकेतों और आधी हँसी में टाल रहे थे, वह आखिर सीधे शब्दों में सामने आई थी। उसने अनंत से कहा, “कल शाम मैं माँ से बात करूँगी। अगर सब ठीक रहा, तो रविवार की वर्कशॉप के बाद तुम उनसे मिल लेना। किसी औपचारिकता की तरह नहीं, बस वैसे ही।”
अनंत ने सिर हिलाया। “वैसे ही,” उसने दोहराया, लेकिन उसके स्वर में वह हल्की चमक थी जो किसी लंबे इंतज़ार के बाद आती है। रिद्धिमा बाहर निकली तो उसने देखा कि फोन पर फैमिली ग्रुप फिर चमक रहा है। इस बार उसने उसे तुरंत नहीं खोला। उसने छाता फैलाया, दो कदम चली, फिर पीछे मुड़कर काँच के पार देखा। अनंत अब भी उसी कोने में खड़ा था, जहाँ से उनकी शुरुआत हुई थी—किताबों, नोट्स और उन बातों के बीच जिन्हें कहने में दोनों को इतना समय लगा। उसे अचानक लगा कि जीवन में कुछ चीज़ें सही जगह पहुँचने के लिए गलती का रास्ता लेती हैं। वह मीम भी शायद वैसा ही था। गलत ग्रुप में गया, गलत समय पर गया, लेकिन उसी ने वह परदा हटा दिया जिसके पीछे वे दोनों अपने-अपने डर सँभाले बैठे थे। अब कहानी दूसरों के स्क्रीनशॉट से नहीं, उनकी अपनी आवाज़ से आगे बढ़नी थी। और भुवनेश्वर की उस भीगी शाम में, बुकस्टोर के छोटे-से कोने से बाहर निकलते हुए, रिद्धिमा को पहली बार लगा कि सच कभी-कभी रिश्ते का नाम नहीं माँगता, सिर्फ़ छुपना बंद करने की हिम्मत माँगता है।