कानपुर का चकेरी एयरपोर्ट बहुत बड़ा नहीं है, लेकिन वहाँ इंतज़ार हमेशा बड़ा लगता है। खासकर तब, जब किसी एक फ्लाइट के उतरने के साथ सिर्फ यात्री नहीं, कई महीनों से दबे हुए सवाल भी बाहर आने वाले हों। उस शाम आगमन द्वार के सामने लगी पीली रोशनी में लोग अपने-अपने नाम पुकारते बोर्ड, फूलों के छोटे गुलदस्ते और मोबाइल कैमरे लिए खड़े थे। ट्रॉली के पहियों की आवाज़ बार-बार चमकती फर्श पर फैल जाती थी। राघव भीड़ से थोड़ा हटकर खड़ा था। उसने एक हाथ में कार की चाबी पकड़ी हुई थी और दूसरे हाथ से बार-बार फोन की स्क्रीन देख रहा था। व्हॉट्सऐप पर ऊपर वही पुराना ग्रुप खुला था—‘Match Night Bakaiti’। हर दो सेकंड में नया मीम गिर रहा था। किसी ने लिखा था, “आज जो हारेगा, वही ex को text करेगा।” नीचे हँसते इमोजी की लाइन थी। राघव ने फोन लॉक कर दिया। उसे लगा, दुनिया को हर बात खेल जैसी क्यों लगती है, जबकि कुछ शामें खेल नहीं होतीं।
वह नंदिनी का इंतज़ार कर रहा था। पूरे आठ महीने बाद। आखिरी बार जब वे मिले थे, तब भीड़ नहीं थी, सिर्फ एक लंबी चुप्पी थी। सिविल लाइंस की एक कॉफी शॉप के बाहर खड़े-खड़े उन्होंने रिश्ता खत्म किया था—या यूँ कहें, खत्म होने दिया था। कोई बहुत बड़ा धोखा नहीं हुआ था, कोई चीख-पुकार भी नहीं। बस दोनों ने धीरे-धीरे अपनी थकान को आदत समझ लिया था। राघव हर मुश्किल बात को मज़ाक में टाल देता, हर भारी शाम को क्रिकेट स्कोर, मीम या वॉइस नोट की हल्की चुहल में बदल देता। नंदिनी को शुरू में वही बात पसंद आई थी। उसे लगता था, यह लड़का जिंदगी को हल्का बना सकता है। लेकिन बाद में उसी हल्केपन ने उसे अकेला कर दिया। जब भी वह कहती कि उसे कुछ गंभीर बात करनी है, राघव या तो ऑफिस का बहाना बना देता या कोई मैच-नाइट लाइन फेंककर बात मोड़ देता—“अभी mood खराब मत करो, powerplay चल रहा है।” उस एक वाक्य ने कई बार उसके दिल के दरवाजे पर दस्तक दी थी।
आज वह बेंगलुरु से लौट रही थी। आधिकारिक कारण सीधा था—उसकी बड़ी बहन की डिलीवरी होने वाली थी, और माँ ने उसे कुछ हफ्तों के लिए बुला लिया था। असली कारण थोड़ा टेढ़ा था। पिछले महीनों में उसने खुद को काम में डुबो दिया, शहर बदला, घर बदला, अपने बारे में कई बातें बदलने की कोशिश की, लेकिन कुछ रिश्ते इतने साफ नहीं टूटते कि आदमी निश्चिंत हो जाए। वे अंदर कहीं अपनी जगह बनाए रखते हैं। इस बार एयरपोर्ट से लेने उसकी बहन का पति आने वाला था, लेकिन अचानक अस्पताल जाना पड़ गया। माँ ने जल्दबाज़ी में राघव को फोन कर दिया था। राघव और नंदिनी के घर वाले इस कहानी का वह हिस्सा थे जो कभी पूरी तरह बंद नहीं हुआ। सबको लगता था कि एक ठीक-ठाक लड़का और एक समझदार लड़की इतनी आसानी से खत्म नहीं हो सकते। सिर्फ वही दो लोग जानते थे कि रिश्ते खराब लोग नहीं, खराब समय और अधूरी बातें भी तोड़ते हैं।
आगमन द्वार खुला तो लोग एक साथ आगे खिंच गए। राघव की साँस जैसे गले में अटक गई। पहले कुछ बिजनेस ट्रैवलर निकले, फिर एक बुज़ुर्ग दंपती, फिर दो कॉलेज के लड़के, और उसके बाद नंदिनी दिखी। ऑफ-व्हाइट कुर्ता, कंधे पर लैपटॉप बैग, एक हाथ से ट्रॉली संभालते हुए, और चेहरे पर वही संयम जो वह घबराने पर ओढ़ लेती थी। उसने राघव को देखा तो कदम आधे पल को रुक गए। न हैरानी पूरी थी, न सहजता। जैसे किसी ने पुराने गाने को अचानक वहीं से चला दिया हो जहाँ से वह कभी बंद हुआ था।
“तुम आए?” उसके मुँह से यही निकला।
राघव ने हल्की मुस्कान की, “अंकित अस्पताल में है। आंटी ने कहा, मैं पास था।”
“पास थे?” उसने पूछा, “या बुला लिया गया?”
उसके सवाल में तंज कम था, थकान ज्यादा। राघव ने ट्रॉली का हैंडल पकड़ लिया। “दोनों समझ लो।”
वे साथ-साथ बाहर की तरफ बढ़े। मई की शुरुआत की हवा में गर्मी थी, लेकिन शाम ने उसे थोड़ा नरम कर दिया था। पार्किंग तक जाते हुए उनके बीच कोई बड़ी बात नहीं हुई। सिर्फ छोटी, औपचारिक बातें—फ्लाइट समय पर थी या नहीं, सामान इतना ही है, बेंगलुरु में बारिश शुरू हुई या नहीं। मगर कई बार रिश्तों की सबसे खतरनाक स्थिति यही होती है कि लोग बहुत सभ्य हो जाएँ। सभ्यता उस दूरी का दूसरा नाम बन जाती है जिसमें दिल सच बोलने से डरता है।
कार में बैठते ही राघव ने एसी चालू किया। डैशबोर्ड पर फोन फिर चमका। ग्रुप में नया संदेश आया था—“जिसकी crush उतरते ही ‘पहले पानी पिलाओ’ बोले, वही asli winner।” नीचे फिर हँसते इमोजी। नंदिनी की नज़र स्क्रीन पर चली गई। उसने अनचाहे ही हँस दिया। इतने महीनों बाद उनकी पहली साझा प्रतिक्रिया हँसी थी।
“अब भी वही ग्रुप?” उसने सीट बेल्ट बाँधते हुए पूछा।
“अब भी वही,” राघव ने कहा, “लोग बदलते कम हैं, display picture बदलते ज़्यादा हैं।”
नंदिनी ने खिड़की के बाहर देखते हुए कहा, “तुम भी ज़्यादा नहीं बदले लगते।”
“तुम्हें देखकर लग रहा है कि यह complaint है।”
“शायद observation है।”
कार एयरपोर्ट रोड से मुख्य सड़क पर उतर आई। दूर-दूर तक होर्डिंग्स की लाइटें थीं, कुछ जगहों पर फल वाले ठेले, कहीं शादी वाले लॉन जगमगाते हुए। शहर वैसा ही था, पर दोनों उसके भीतर वैसा महसूस नहीं कर रहे थे। रेडियो पर कमेंट्री चल रही थी। कोई IPL मैच अपने आखिरी ओवरों में था। कमेंटेटर की आवाज़ में वह परिचित बेचैनी थी जो करोड़ों लोगों को स्क्रीन से बाँध देती है। राघव ने वॉल्यूम थोड़ा कम किया, मगर बंद नहीं किया। नंदिनी ने ध्यान से उसे देखा। पहले वह ऐसी आवाज़ें पूरा बढ़ा देता था, जैसे किसी भी खामोशी को भर देना उसका निजी कर्तव्य हो।
“तुमने कम क्यों किया?” उसने पूछा।
राघव ने स्टीयरिंग पर उंगलियाँ कसते हुए कहा, “क्योंकि अब समझ में आता है कि हर खाली जगह को शोर से भरना ज़रूरी नहीं होता।”
यह वाक्य कार में टिक गया। नंदिनी ने तुरंत जवाब नहीं दिया। उसकी आँखें सामने थीं, मगर ध्यान कहीं भीतर जा चुका था। बाहर ट्रैफिक सिग्नल पर बाइकें रुक रही थीं, डिलीवरी वाले लड़के फोन देख रहे थे, और सड़क किनारे चायवाले के पास छोटे टीवी पर वही मैच चल रहा था। पूरे शहर में जैसे एक साथ दो चीज़ें मौजूद थीं—खेल की हल्की उत्तेजना और निजी जीवन का भारीपन।
कुछ मिनट बाद नंदिनी ने खुद बात शुरू की। “तुम्हें पता है, मैं बेंगलुरु जाकर सबसे ज़्यादा किस चीज़ से दूर हुई?”
“किससे?”
“तुम्हारे jokes से नहीं,” उसने कहा, “बल्कि उस feeling से कि मैं कुछ जरूरी बोलूँ और तुम उसे मीम बना दो। शुरू में मुझे लगता था, तुम मुझे हँसाते हो। बाद में समझ में आया, तुम कई बार मुझे सुनते ही नहीं थे।”
राघव ने कार थोड़ा धीमी की। उसे यह वाक्य नया नहीं लगा। शायद इसलिए ज्यादा चुभा। नंदिनी यह बात पहले भी कई रूपों में कह चुकी थी, लेकिन तब हर बार उसने उसे या तो overthinking कहा था या timing खराब। उसे लगता था कि भारी बातचीत से बच जाना समझदारी है। उसके घर में सालों तक झगड़े इतने तेज़ हुए थे कि उसने मन ही मन तय कर लिया था—वह कभी आवाज़ ऊँची नहीं करेगा, कभी माहौल भारी नहीं होने देगा। लेकिन उसने यह नहीं समझा कि हर तनाव को हल्केपन में बदल देना भी एक तरह की बेरुख़ी हो सकती है।
“मैं सुनता था,” उसने धीरे से कहा, “बस सही तरह से नहीं सुनता था।”
“हाँ,” नंदिनी ने सिर हिलाया, “और शायद मैं भी सही तरह से बोलती नहीं थी। मैं हर बार बात तब शुरू करती थी जब मैं पहले ही बहुत भर चुकी होती थी। फिर मुझे लगता था, तुमने तुरंत सब समझ लेना चाहिए।”
राघव ने पहली बार उसकी तरफ पूरा देखा। “तो हम दोनों late थे?”
नंदिनी मुस्कुराई, लेकिन वह मुस्कान दुख से होकर आई थी। “शायद। तुम जवाब देने में late थे, मैं मान लेने में late थी।”
पीछे से किसी दोस्त का कॉल आया। स्क्रीन पर नाम चमका—‘Vishu Match Guru’। राघव ने एक नज़र डालकर कॉल काट दिया। दो सेकंड बाद फिर कॉल। इस बार उसने फोन silent कर दिया। नंदिनी ने हल्के आश्चर्य से पूछा, “आज match guru नाराज़ हो जाएगा।”
“होने दो,” राघव ने कहा, “हर ओवर live देखना ज़रूरी नहीं। कुछ चीज़ें highlights में भी समझ आती हैं। लेकिन कुछ बातें अगर उसी वक्त न सुनी जाएँ, तो फिर कुछ नहीं बचता।”
नंदिनी की पलकें झुक गईं। शायद उसे याद आया कि ब्रेकअप वाली शाम भी राघव के फोन पर लगातार मैच अपडेट आ रहे थे। उसने तब गुस्से में कहा था, “तुम्हें हार-जीत हर जगह खेल जैसी लगती है।” और राघव ने हँसकर जवाब दिया था, “इतना dramatic मत बनो।” वही रात उनके बीच आखिरी बड़ी दरार बन गई थी। आज पहली बार राघव को उस जवाब की पूरी मूर्खता महसूस हो रही थी।
“मैंने तुम्हें बहुत हल्के में लिया,” उसने साफ शब्दों में कहा। “तुम्हें नहीं, तुम्हारी बातों को। मुझे लगता था कि हम कहीं नहीं जा रहे, इसलिए जल्दी क्या है। लेकिन लोग इंतज़ार में भी थकते हैं, यह मैंने बहुत देर से समझा।”
कार गंगा बैराज की तरफ मुड़ने वाली सड़क पर आ लगी थी। रात गहराने लगी थी। पुल के पास की हवा थोड़ी खुली, थोड़ी नम थी। शहर की बत्तियाँ पानी में लंबी रेखाओं की तरह टूट रही थीं। नंदिनी ने खिड़की का शीशा थोड़ा नीचे कर दिया। “और मैंने भी तुम्हारे डर को सिर्फ लापरवाही समझ लिया,” उसने धीरे से कहा। “बाद में जब तुम्हारी बहन ने बताया कि घर में कैसे माहौल रहा है, तब समझ में आया कि तुम हर गंभीर बातचीत से भागते नहीं थे, उससे डरते थे।”
राघव ने कुछ नहीं कहा। कई बार आदमी को माफी तब मिलती है जब वह खुद को सही साबित करना बंद कर देता है। उसके लिए यह नई बात थी। उसने सिर्फ इतना पूछा, “अगर तब यह सब समझ में आ जाता, तो क्या हम बच जाते?”
नंदिनी ने लंबे समय बाद बिना बचाव के सच बोला। “पता नहीं। शायद नहीं। शायद हाँ। लेकिन कम-से-कम हम इस तरह अधूरे नहीं टूटते।”
यह सुनकर राघव को अजीब राहत मिली। हर कहानी का सुखद अंत साथ रहना नहीं होता; कई बार सच्चा अंत वह होता है जहाँ लोग पहली बार अपनी विफलता को ईमानदारी से देख पाते हैं। मगर उस रात कहानी वहाँ रुकी नहीं। जब वे स्वरूप नगर की तरफ पहुँचे, सड़क थोड़ी खाली हो गई। रेडियो पर मैच खत्म हो चुका था। किसी टीम की जीत की जोरदार आवाज़ आई, फिर पोस्ट-मैच विश्लेषण शुरू हो गया। राघव ने रेडियो बंद कर दिया। कार में अब सिर्फ इंजन की मुलायम आवाज़ थी।
“बेंगलुरु वापस कब जाओगी?” उसने पूछा।
“दो हफ्ते,” नंदिनी ने कहा। “अगर दीदी की तबीयत ठीक रही तो।”
“और इन दो हफ्तों में?”
नंदिनी ने उसकी तरफ देखा। यह वही नज़र थी जिसमें कभी उसका पूरा भरोसा बसता था। “इन दो हफ्तों में,” उसने कहा, “हम यह कोशिश कर सकते हैं कि हर बात को या तो फैसला या फ्लर्ट न बनाना पड़े। शायद पहले इंसानों की तरह बात करें। देखेंगे कि कुछ बचा है या सिर्फ याद बची है।”
राघव ने बहुत धीरे सिर हिलाया। उसे लगा, यही सबसे बड़ी बात है जो उसे मिल सकती थी—तुरंत माफी नहीं, तुरंत रिश्ता नहीं, बल्कि एक मौका कि वह इस बार सुन सके। उसने मज़ाक करने की कोशिश नहीं की। कोई चतुर लाइन नहीं बोली। सिर्फ पूछा, “कल शाम चलोगी? कहीं भी। बिना ग्रुप चैट, बिना score update.”
नंदिनी हँसी। “तुम्हारे लिए यह बड़ा त्याग है।”
“हाँ,” उसने भी हँसकर कहा, “लेकिन शायद playoff से बड़ा नहीं, फिर भी काफी बड़ा।”
इस बार उनकी हँसी में पुरानी गर्माहट की बहुत हल्की वापसी थी। इतनी कि उसे पकड़ा नहीं जा सकता था, मगर नकारा भी नहीं जा सकता था। घर के बाहर कार रुकी तो ऊपर बालकनी में रोशनी जल रही थी। अंदर कोई इंतज़ार कर रहा था—परिवार, जिम्मेदारियाँ, आने वाले दिनों की भागदौड़। नंदिनी ने सीट बेल्ट खोली, पर उतरने से पहले ठिठकी। “राघव,” उसने कहा, “आज तुम्हारे jokes बुरे नहीं लगे।”
राघव ने उसकी तरफ देखा। “क्यों?”
“क्योंकि आज उनके पीछे छिपना नहीं था,” उसने जवाब दिया।
नंदिनी ट्रॉली निकालकर गेट की तरफ बढ़ गई। राघव कार से बाहर आया, सामान बरामदे तक पहुँचाया, फिर एक कदम पीछे हट गया। उसे लगा, कुछ रिश्ते हवाई जहाज़ की तरह होते हैं—काफी देर तक बादलों में डोलते रहते हैं, फिर सही रनवे मिले तो उतरते हैं। सुरक्षित उतरने के बाद भी यात्रियों को जल्दी नहीं मचानी चाहिए; पहले साँस सामान्य होती है, फिर लोग अपना सामान सँभालते हैं, फिर बाहर निकलते हैं। उस रात उनके बीच भी शायद यही हुआ था। कोई चमत्कार नहीं हुआ, कोई फिल्मी आलिंगन नहीं, कोई वादा नहीं कि अब सब पहले जैसा हो जाएगा। बस इतना हुआ कि मैच-नाइट मीम्स, live chat और चुहल से शुरू हुई बातचीत आखिरकार उन दो लोगों को वहाँ ले आई जहाँ वे महीनों पहले पहुँच सकते थे—सच के पास। और कई बार प्रेम की वापसी इसी तरह होती है, शोर से नहीं, सुनने की नई क्षमता से।